
क्या पाया क्या खोया मैंने ,कितना अश्क बहाया मैंने,
कभी यूँ लगता है सब मेरे अपने ही हैं।
कभी ये लगता है जैसे सबको ही ठुकराया मैंने,
दिया जो तुमने मुझको कम तो नहीं है,
फिर भी क्यों खुद को यूँ ही भटकाया मैंने,
सफ़र ये मेरा कट ही जायेगा इक दिन,
तन्हा-तन्हा क्यूँ खुद को उलझाया मैंने
मेरे गम की बात को अब तो रहने ही दो
किस्मत में जितना था उतना पाया मैंने.
कभी यूँ लगता है सब मेरे अपने ही हैं।
कभी ये लगता है जैसे सबको ही ठुकराया मैंने,
दिया जो तुमने मुझको कम तो नहीं है,
फिर भी क्यों खुद को यूँ ही भटकाया मैंने,
सफ़र ये मेरा कट ही जायेगा इक दिन,
तन्हा-तन्हा क्यूँ खुद को उलझाया मैंने
मेरे गम की बात को अब तो रहने ही दो
किस्मत में जितना था उतना पाया मैंने.


